परिचय (Introduction)
इतिहास में बहुत से महान लोग आए—राजा, संत, दार्शनिक, सुधारक—परन्तु यीशु मसीह (Jesus Christ) जैसा कोई दूसरा नहीं हुआ। दो हज़ार वर्ष बीत जाने के बाद भी उनका नाम जीवित है, उनका संदेश संसार के कोने-कोने में गूँज रहा है, और करोड़ों लोगों का जीवन आज भी उनके द्वारा बदला जा रहा है।
यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक और व्यक्तिगत है—
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| Who Is Jesus Christ? |
“यीशु मसीह कौन हैं?”
क्या वे केवल एक महान शिक्षक थे? एक नबी? एक चमत्कारी व्यक्ति? या वास्तव में वे वही हैं, जो उन्होंने स्वयं कहा—परमेश्वर का पुत्र और संसार का उद्धारकर्ता?
इस लेख में हम बाइबल के वचनों के आधार पर, सरल और गहराई से, यीशु मसीह की सच्ची पहचान को समझेंगे।
1. यीशु मसीह – केवल एक मनुष्य नहीं
बहुत से लोग यीशु को एक अच्छे इंसान या नैतिक शिक्षक मानते हैं, लेकिन बाइबल उन्हें इससे कहीं अधिक बताती है।
“आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।”
(यूहन्ना 1:1)
और आगे लिखा है:
“वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच में निवास किया।”
(यूहन्ना 1:14)
यह “वचन” ही यीशु मसीह हैं।
अर्थात यीशु केवल परमेश्वर के दूत नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर हैं, जो मनुष्य का रूप धारण करके संसार में आए।
2. यीशु मसीह का जन्म – परमेश्वर की योजना
यीशु का जन्म कोई साधारण घटना नहीं थी। यह परमेश्वर की पहले से ठहराई गई योजना थी।
“देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा।”
(यशायाह 7:14)
इम्मानुएल का अर्थ है – “परमेश्वर हमारे साथ”।
यीशु का जन्म यह दर्शाता है कि परमेश्वर दूर बैठा हुआ नहीं है, बल्कि वह हमारे दुख, पीड़ा और संघर्ष को समझने के लिए स्वयं हमारे बीच आया।
3. यीशु मसीह का जीवन – प्रेम और करुणा का उदाहरण
यीशु का पूरा जीवन प्रेम, दया और क्षमा से भरा हुआ था।
उन्होंने:
• रोगियों को चंगा किया
• भूखों को भोजन दिया
• पापियों को अपनाया
• तिरस्कृत लोगों को सम्मान दिया
“मनुष्य का पुत्र इसलिये आया कि खोजे और उद्धार करे जो खो गया है।”
(लूका 19:10)
यीशु का प्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कार्यों में प्रकट हुआ।
4. यीशु मसीह की शिक्षा – जीवन बदल देने वाला सत्य
यीशु की शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रभावशाली हैं जितनी पहले थीं।
“मैं मार्ग, सत्य और जीवन हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं आता।”
(यूहन्ना 14:6)
यह वचन बहुत स्पष्ट है। यीशु केवल सत्य बताने वाले नहीं, बल्कि स्वयं सत्य हैं।
उनकी शिक्षाएँ हमें सिखाती हैं:
• शत्रुओं से प्रेम करो
• क्षमा करो
• नम्र बनो
• परमेश्वर पर भरोसा रखो
5. यीशु मसीह और पाप की समस्या
मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या पाप है। पाप हमें परमेश्वर से अलग करता है।
“क्योंकि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।”
(रोमियों 3:23)
यीशु इस समस्या का समाधान लेकर आए।
“देखो, परमेश्वर का मेम्ना, जो संसार का पाप उठा ले जाता है।”
(यूहन्ना 1:29)
यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण देकर हमारे पापों का दण्ड अपने ऊपर ले लिया।
6. क्रूस – प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल
क्रूस कोई हार नहीं थी, बल्कि प्रेम की विजय थी।
“परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया।”
(यूहन्ना 3:16)
यीशु ने स्वेच्छा से अपना जीवन दिया, ताकि हम क्षमा और नया जीवन प्राप्त कर सकें।
यह प्रेम शर्तों पर आधारित नहीं था।
यह प्रेम हमारे योग्य होने पर निर्भर नहीं था।
7. पुनरुत्थान – मृत्यु पर विजय
यदि यीशु केवल मरे होते, तो कहानी यहीं समाप्त हो जाती।
लेकिन वे जी उठे।
“वह यहाँ नहीं है, वह जी उठा है।”
(मत्ती 28:6)
यीशु का पुनरुत्थान यह सिद्ध करता है कि:
• वे वास्तव में परमेश्वर हैं
• मृत्यु की शक्ति टूट चुकी है
• विश्वास करने वालों के लिए अनन्त जीवन है
8. यीशु मसीह – एक जीवित उद्धारकर्ता
यीशु आज भी जीवित हैं। वे केवल इतिहास की पुस्तक में नहीं, बल्कि आज भी लोगों के दिलों में कार्य कर रहे हैं।
“यीशु मसीह कल, आज और युगानुयुग एक सा है।”
(इब्रानियों 13:8)
जो लोग टूटे हुए हैं, निराश हैं, या जीवन का अर्थ खोज रहे हैं—यीशु आज भी उन्हें बुलाते हैं।
9. यीशु मसीह और व्यक्तिगत संबंध
यीशु धर्म नहीं, रिलेशनशिप (relationship) प्रदान करते हैं।
“देखो, मैं द्वार पर खड़ा होकर खटखटाता हूँ।”
(प्रकाशितवाक्य 3:20)
वह जबरदस्ती नहीं करते। वह आमंत्रण देते हैं।
10. निष्कर्ष – आपके लिए यीशु कौन हैं?
यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है—
यीशु मसीह आपके लिए कौन हैं?
केवल एक नाम?
या जीवन बदल देने वाला उद्धारकर्ता?
“यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु कहे और अपने मन से विश्वास करे, तो तू उद्धार पाएगा।”
(रोमियों 10:9)
यीशु मसीह केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की आशा और भविष्य की गारंटी हैं।
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